नई दिल्ली (Action Bharat) | दिल्ली में हालिया राजनीतिक प्रदर्शनों के दौरान सोशल मीडिया पर कथित भ्रामक और एडिट किए गए वीडियो पोस्ट करने के मामलों को लेकर दिल्ली पुलिस सतर्क हो गई है। जागरण की रिपोर्ट के मुताबिक, पुलिस ने सोशल मीडिया पर निगरानी रखने और भ्रामक दावों का खंडन करने के लिए 20 से 25 पुलिसकर्मियों की विशेष टीमें बनाई हैं। पुलिस प्रदर्शन स्थलों के वीडियो फुटेज का विश्लेषण कर ऐसे कंटेंट क्रिएटर्स की पहचान करने और उनका डेटाबेस तैयार करने पर भी काम कर रही है।
जुलाई में 56 और अक्टूबर में 49 भ्रामक पोस्ट का दावा
पुलिस अधिकारियों के हवाले से प्रकाशित रिपोर्ट के अनुसार, जुलाई में CJP के प्रदर्शन के दौरान 56 कथित फर्जी पोस्ट सामने आए थे। वहीं, 2 से 11 अक्टूबर के बीच 49 भ्रामक पोस्ट किए जाने का दावा किया गया है। रिपोर्ट के मुताबिक, दिल्ली पुलिस ने इन पोस्ट का जवाब X और Instagram पर दिया।
पुलिस का आरोप है कि कुछ लोगों ने पुलिसकर्मियों और केंद्रीय सुरक्षा बलों की कार्रवाई के वीडियो को एडिट करके या संदर्भ से अलग प्रस्तुत करके सोशल मीडिया पर प्रसारित किया। हालांकि, किसी पोस्ट को भ्रामक मानने और उसके लिए किसी व्यक्ति को जिम्मेदार ठहराने के लिए संबंधित सामग्री और साक्ष्यों की जांच जरूरी है।
CCTV और वीडियो फुटेज से होगी पहचान
दिल्ली पुलिस भविष्य में प्रदर्शनों के दौरान रिकॉर्ड किए गए वीडियो फुटेज का विश्लेषण कर रही है। इसका उद्देश्य प्रदर्शन स्थलों पर मौजूद कंटेंट क्रिएटर्स की पहचान करना और घटनाओं से संबंधित रिकॉर्ड तैयार करना बताया गया है।
पुलिस वास्तविक मीडियाकर्मियों और अन्य कंटेंट क्रिएटर्स के बीच अंतर करने के लिए स्पष्ट वेरिफिकेशन प्रोटोकॉल लागू करने पर भी विचार कर रही है।
सोशल मीडिया पर चौबीसों घंटे निगरानी
रिपोर्ट के अनुसार, विशेष टीमें इंटरनेट मीडिया पर प्रसारित होने वाली पोस्ट पर नजर रखती हैं और कथित गलत सूचनाओं का खंडन करती हैं। दिल्ली पुलिस के प्रवक्ता अतिरिक्त पुलिस आयुक्त राजीव रंजन ने भी डिजिटल प्लेटफॉर्म के दुरुपयोग को कानून-व्यवस्था के लिए चुनौती बताया है।
फेक न्यूज पर कार्रवाई, लेकिन पत्रकारिता की स्वतंत्रता भी जरूरी
सोशल मीडिया पर गलत जानकारी फैलने से जनता में भ्रम पैदा हो सकता है। वहीं, पुलिस कार्रवाई की रिपोर्टिंग, सवाल पूछना और प्रशासन की आलोचना करना भी स्वतंत्र पत्रकारिता का महत्वपूर्ण हिस्सा है।
इसलिए जरूरी है कि कार्रवाई ठोस साक्ष्यों के आधार पर हो और वास्तविक पत्रकारिता तथा जानबूझकर फैलाए गए झूठे दावों के बीच स्पष्ट अंतर किया जाए। केवल पुलिस की आलोचना करने या किसी घटना का वीडियो रिकॉर्ड करने से किसी व्यक्ति को फेक न्यूज फैलाने वाला नहीं माना जाना चाहिए।
अब नजर इस बात पर रहेगी कि दिल्ली पुलिस की नई रणनीति भ्रामक सूचनाओं पर कितनी प्रभावी साबित होती है और इसके साथ पत्रकारिता की स्वतंत्रता तथा नागरिकों के अधिकारों की रक्षा कैसे सुनिश्चित की जाती है।
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