नई दिल्ली। महिलाओं और यात्रियों की सुरक्षा के लिए बसों में लगाए गए इमरजेंसी पैनिक बटन अब खुद सवालों के घेरे में हैं। संसद की परिवहन, पर्यटन और संस्कृति संबंधी स्थायी समिति की रिपोर्ट में सामने आया है कि कई बसों में लगे ये बटन प्रभावी तरीके से काम नहीं कर रहे हैं, क्योंकि इनके अलर्ट पर तुरंत कार्रवाई करने के लिए पर्याप्त समर्पित रिस्पॉन्स सिस्टम मौजूद नहीं है।
सबसे हैरान करने वाली बात यह है कि बस ऑपरेटरों के मुताबिक, जिन पैनिक बटनों की कीमत बेहद कम है, उन्हीं की फिटनेस जांच के नाम पर प्रति बस ₹2,500 से लेकर ₹25,000 तक का खर्च बताया जा रहा है।
जिस बटन से सुरक्षा होनी थी, वही बेकार!
निर्भया कांड के बाद सार्वजनिक परिवहन में महिलाओं की सुरक्षा को लेकर कई सुरक्षा उपाय अनिवार्य किए गए थे। इनमें वाहन की लोकेशन ट्रैकिंग और इमरजेंसी अलर्ट सिस्टम भी शामिल था।
सरकारी व्यवस्था के तहत सार्वजनिक सेवा वाहनों में Vehicle Location Tracking Device यानी VLTD और Emergency Panic Button को सुरक्षा व्यवस्था से जोड़ने का उद्देश्य था, ताकि आपात स्थिति में अलर्ट संबंधित सिस्टम तक पहुंच सके।
लेकिन संसद की समिति के सामने बस ऑपरेटरों ने जो स्थिति बताई, उसने पूरी व्यवस्था पर सवाल खड़े कर दिए हैं।
₹15-20 का बटन, जांच के नाम पर हजारों रुपये?
रिपोर्ट के मुताबिक, ऑपरेटरों ने समिति को बताया कि पैनिक बटन की वास्तविक कीमत लगभग ₹15-20 हो सकती है, लेकिन वाहन की फिटनेस प्रक्रिया में इसकी जांच के लिए उन्हें हजारों रुपये खर्च करने पड़ते हैं।
ऑपरेटरों द्वारा बताए गए आंकड़ों के अनुसार यह राशि ₹2,500 से ₹25,000 प्रति वाहन तक हो सकती है।
हालांकि, इन भुगतानों को सीधे तौर पर अवैध ‘वसूली’ या रिश्वत कहना उचित नहीं होगा जब तक संबंधित विभाग या जांच एजेंसी इसकी पुष्टि न करे। समिति के सामने रखे गए ऑपरेटरों के दावे और उनसे जुड़ी प्रक्रिया की पारदर्शिता पर सवाल जरूर गंभीर हैं।
असली समस्या—अलर्ट जाएगा तो जाएगा कहां?
पैनिक बटन की सबसे बड़ी समस्या सिर्फ बटन का काम करना नहीं, बल्कि उसके पीछे मौजूद Emergency Response System है।
अगर किसी महिला यात्री के साथ बस में आपात स्थिति पैदा होती है और वह पैनिक बटन दबाती है, लेकिन उस अलर्ट को देखने और तत्काल पुलिस या सहायता भेजने वाला कोई सक्रिय नियंत्रण केंद्र नहीं है, तो बटन सिर्फ बस की दीवार पर लगा एक स्विच बनकर रह जाता है।
यही वह समस्या है जिस पर संसद की समिति ने गंभीर चिंता जताई है।
पहले से सरकारी योजनाओं में यह व्यवस्था विकसित करने का प्रयास किया गया था। केंद्र ने राज्यों में बसों और अन्य सार्वजनिक सेवा वाहनों की लोकेशन और आपात अलर्ट की निगरानी के लिए कंट्रोल रूम की व्यवस्था पर जोर दिया था।
112 से जोड़ने की कोशिश भी हुई
रिपोर्ट के मुताबिक, सड़क परिवहन मंत्रालय ने समिति को बताया कि कई राज्यों में पैनिक बटन सिस्टम को 112 इमरजेंसी रिस्पॉन्स सिस्टम से जोड़ने की व्यवस्था की गई है।
लेकिन गलत अलार्म की समस्या के कारण कुछ राज्यों में इस व्यवस्था को बंद किए जाने की बात भी सामने आई।
यानी एक तरफ सरकार चाहती है कि सिस्टम दोबारा प्रभावी तरीके से काम करे, वहीं बस ऑपरेटर इसे अतिरिक्त बोझ मान रहे हैं।
समिति ने पूछा—CCTV क्यों नहीं?
संसदीय समिति के सामने यह सवाल भी उठाया गया कि अगर पैनिक बटन की व्यवस्था प्रभावी नहीं हो पा रही है तो बसों में CCTV कैमरों की व्यवस्था को मजबूत क्यों नहीं किया जाता।
मंत्रालय की ओर से बताया गया कि नई बसों में कैमरे लगाए जाने को अनिवार्य किया जा रहा है।
समिति ने सुझाव दिया है कि सार्वजनिक परिवहन वाहनों में इमरजेंसी बटन, कॉल सुविधा और वाहन की लाइव लोकेशन ट्रैकिंग जैसी सुरक्षा व्यवस्थाओं को उन राज्यों से आगे भी लागू किया जाना चाहिए जहां इसकी दिशा में प्रगति हुई है।
महिला सुरक्षा के नाम पर सिस्टम कितना काम कर रहा?
इस पूरे मामले का सबसे बड़ा सवाल यही है कि अगर पैनिक बटन दबाने के बाद सहायता समय पर नहीं पहुंच सकती, तो केवल बटन लगाना किस काम का?
सुरक्षा व्यवस्था का मतलब सिर्फ बस में उपकरण लगाना नहीं, बल्कि बटन → अलर्ट → कंट्रोल रूम → पुलिस/रेस्क्यू टीम → तत्काल सहायता की पूरी श्रृंखला को 24 घंटे सक्रिय रखना है।
अगर इस श्रृंखला की एक भी कड़ी काम नहीं करती, तो करोड़ों रुपये खर्च करके लगाया गया सुरक्षा तंत्र यात्रियों के लिए वास्तविक सुरक्षा में बदल नहीं पाएगा।
Action Bharat का सवाल
बस में ₹20 का बटन लगाकर अगर उसके अलर्ट का जवाब देने वाला सिस्टम ही नहीं है, तो यह सुरक्षा व्यवस्था है या सिर्फ कागजी खानापूर्ति?
संसदीय समिति की रिपोर्ट ने अब इस सवाल को सीधे सरकार और परिवहन विभागों के सामने खड़ा कर दिया है। जरूरत इस बात की है कि पैनिक बटन की सिर्फ फिटनेस जांच न हो, बल्कि यह भी सुनिश्चित किया जाए कि मुसीबत के वक्त बटन दबते ही मदद वास्तव में पहुंचे।
