ग्रेटर नोएडा (Action Bharat) | CJP विरोध-प्रदर्शन से जुड़े मामले में छात्र को 5 लाख रुपये का पर्सनल बॉन्ड भरने का नोटिस जारी करने वाले ग्रेटर नोएडा के एग्जीक्यूटिव मजिस्ट्रेट को निलंबित कर दिया गया है। सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने गुरुवार को सुप्रीम कोर्ट को यह जानकारी दी।
मजिस्ट्रेट ने गौतम बुद्ध यूनिवर्सिटी के छात्र अक्षत त्रिपाठी को नोटिस जारी किया था। छात्र ने इस कार्रवाई को चुनौती देते हुए सुप्रीम कोर्ट में याचिका दायर की थी।
• छात्र से मांगा गया था 5 लाख रुपये का बॉन्ड
मामले में जारी नोटिस में छात्र से छह महीने के लिए 5 लाख रुपये का पर्सनल बॉन्ड भरने और इतनी ही रकम की दो जमानतें देने का प्रस्ताव रखा गया था। नोटिस के लिए BNSS की संबंधित धाराओं का इस्तेमाल किया गया था।
• BNSS की धाराओं के तहत जारी हुआ था नोटिस
याचिका के अनुसार, नोटिस में BNSS की धारा 126 का इस्तेमाल किया गया था। यह प्रावधान कार्यकारी मजिस्ट्रेट को ऐसी स्थिति में शांति बनाए रखने के लिए सिक्योरिटी मांगने की शक्ति देता है, जब किसी व्यक्ति से शांति भंग होने या सार्वजनिक शांति में खलल पड़ने की आशंका बताई जाए।
नोटिस में धारा 135 का भी उल्लेख था, जो संबंधित जानकारी की सच्चाई की जांच की प्रक्रिया से जुड़ी है।
• पुलिस रिपोर्ट के आधार पर जारी किया गया था नोटिस
स्रोत के अनुसार, यह नोटिस इको फर्स्ट पुलिस स्टेशन के एक सब-इंस्पेक्टर की रिपोर्ट के आधार पर जारी किया गया था। रिपोर्ट में आरोप लगाया गया था कि अक्षत त्रिपाठी छात्रों के बीच सरकार-विरोधी और गुमराह करने वाली बातें फैला रहे थे तथा उन्हें प्रस्तावित CJP धरने में शामिल होने के लिए उकसा रहे थे।
• पुलिस ने शांति और कानून-व्यवस्था बिगड़ने की आशंका जताई
रिपोर्ट में दावा किया गया था कि इन गतिविधियों के कारण तनाव पैदा हो रहा था और छात्रों के बीच विवाद या झगड़े की स्थिति बन सकती थी, जिससे सार्वजनिक शांति और कानून-व्यवस्था प्रभावित होने की आशंका थी।
• छात्र ने नोटिस की प्रक्रिया पर उठाए सवाल
अक्षत त्रिपाठी की याचिका में दावा किया गया कि नोटिस में किसी विशेष तारीख, समय, बयान, प्रत्यक्ष कार्रवाई अथवा वास्तविक या आसन्न हिंसा की घटना का उल्लेख नहीं किया गया था, जिसके लिए उन्हें जिम्मेदार ठहराया जा सके।
याचिका में यह भी कहा गया कि आरोपों के समर्थन में छात्र को कोई सामग्री उपलब्ध नहीं कराई गई।
• पेशी के लिए मिला था बेहद कम समय
याचिका में मजिस्ट्रेट द्वारा अपनाई गई प्रक्रिया को भी चुनौती दी गई। 4 सितंबर के नोटिस में छात्र को 5 सितंबर को पेश होने के लिए कहा गया था। याचिका के अनुसार, उन्हें वकील करने, आरोपों को समझने और 5 लाख रुपये की जमानत संबंधी व्यवस्था करने के लिए लगभग एक दिन का ही समय मिला।
• सुप्रीम कोर्ट के पहले के आदेश का भी दिया गया हवाला
याचिका में दावा किया गया कि यह कार्रवाई सुप्रीम कोर्ट के 1 सितंबर के आदेश के विपरीत थी। याचिका के अनुसार, उस आदेश में छात्रों के विरोध-प्रदर्शन से संबंधित FIR को रद्द किया गया था और छात्रों के खिलाफ जबरदस्ती कार्रवाई पर रोक लगाई गई थी।
• अभिव्यक्ति और शांतिपूर्ण प्रदर्शन के अधिकार का मुद्दा
याचिका में यह भी तर्क दिया गया कि छात्र के खिलाफ लगाए गए आरोप संविधान के अनुच्छेद 19(1)(a) के तहत अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और अनुच्छेद 19(1)(b) के तहत शांतिपूर्ण तरीके से एकत्र होने के अधिकार से जुड़े हैं।
• CJI ने मामले पर कड़ा रुख अपनाया था
मुख्य न्यायाधीश सूर्य कांत ने सुनवाई के दौरान बताया कि जब यह मामला उनके सामने पिछली बार आया था, तब उन्होंने इस पर कड़ा रुख अपनाते हुए राज्य से जवाब मांगा था। इसके बाद सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने अदालत को बताया कि संबंधित एग्जीक्यूटिव मजिस्ट्रेट को निलंबित कर दिया गया है।
अब कार्रवाई के बाद उठ रहे बड़े सवाल
एग्जीक्यूटिव मजिस्ट्रेट के निलंबन की जानकारी सुप्रीम कोर्ट में दिए जाने के बाद इस मामले में प्रशासनिक कार्रवाई का एक महत्वपूर्ण कदम सामने आया है। वहीं, छात्र की याचिका में नोटिस जारी करने की प्रक्रिया, आरोपों के आधार और संवैधानिक अधिकारों से जुड़े सवाल उठाए गए हैं।
